बौध्दिक कुलबुलाहट या खुजली
क्या ताजमहल वाकई हिन्दु मंदिर था?
उत्तर भारत में स्थित विभिन्न मंदिरों पर विभिन्न आक्रमणों में आक्रमण किया गया यह एक ऐतिहासिक तथ्य है।आक्रमण के पीछे की मुख्य प्रेरणा के बारे में बहस हो सकती है। धार्मिक उत्साह के अतिरिक्त एक तथ्य यह भी है कि मंदिर महलों की तरह ही सत्ता और सम्पत्ति के भी केन्द्र हुआ करते थे।धार्मिक संस्थान राजाश्रय में ही फलते फूलते थे और राज्य को धर्म से ही वैधता मिलती थी।
यह पुछने से पहले कि उत्तर भारत में दक्षिण भारत की तराह मंदिर क्यों नहीं है उत्तर और दक्षिण भारत के भिन्न सामाजिक -सांस्कृतिक इतिहास की विशिष्टता को तो समझना ही चाहिए बतौर हिन्दू खुद से यह भी पुछना चाहिए कि अपनी जन्म भूमि बिहार में आज बौध्द धर्म का कोई नामो-निशान क्यों नहीं है।क्या हमने से किसी ने पुष्यमित्र का नाम सुना है।बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। हम दक्षिण भारत के मंदिरों पर गर्व करते हैं और वहाँ के द्रविड़ियन उत्तर भारतीय ब्राह्मणों को आक्रमणकारी मानते हैं।क्या कुछ लोगों को पेरियार का नाम याद है।
रही बात ताजमहल के मंदिर होने का तो बहुत सारे बकवासों में एक बकवास यह भी है।

7 Comments:
ये टिप्पणी आपकी नवीनतम प्रविष्टि के लिये..
"कुछ तो हुआ है..कुछ हो गया है, सबको होता है कोई नयी बात नही है।"
आपकी वो Unsaved/deleted Post यहाँ है|
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भाषा की आक्रामकता अपनी व्यक्तित्वहीनता को छुपाने की कोशिश है।
ब्लाग जगत के भाई लोग अकसर आक्रामक मुद्रा अख्तियार कर चुके हैं।मजेदार है कि इस वैक्लपिक माध्यम में भी दबदबा व्यवस्था के पक्षधरों का ही है। ज्यादातर मध्यवर्गीय -सवर्ण हिन्दू - या तो अमेरिका में बस चुके हैं या बसने का सपना देख रहे हैं।बास के पिछलग्गू- चमचागिरी में माहिर। भाषा की आक्रामकता अपनी व्यक्तित्वहीनता को छुपाने की कोशिश है। बीच-बीच में इनको आईना दिखाते रहाने की प्रेरणा से ही इस ब्लाग की शुरुआत कर रहा हूँ।
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आप भी तो कोशिश करते ही लगते हैं।
सागर जी, नया ब्लाग शुरू करने पर आपका स्वागत है।
माफ करना, लेकिन मुझे तो आपके यहां नम्रता कम और आक्र्मकता ज्यादा नजर आई।
"भारतीय मध्यवर्ग खासकर उसकी नयी पीढी से खासी चिढ़ है।"
तो इस चिढ़ से उपजी कुलबुलाहट और खुजली आप भी तो यहां उतार रहे हैं:)
वैसे क्या आप भी भारतीय नहीं हैं? मध्यम वर्ग से नहीं हैं या नयी पीढ़ी से नहीं हैं?
...भाषा की आक्रामकता अपनी व्यक्तित्वहीनता को छुपाने की कोशिश है। ...
सही कुछ मायनों में हो सकता है. परंतु अभी तो भई हिन्दी में लिखने वाले हैं कुल जमा 300. तो चाहे जैसी भी भाषा लिखो चलेगा. लिखते रहो बस! :)
ओ सागर भाई तबियत पानी ठीक हैं ना दोस्त. यह क्या हैं भाई आपके नए चिट्ठे का जो उद्देश्य लिखा हैं वह सच कहता हूँ मेरी समझ में नहीं आ रहा हैं, जिनकी समझमें आया हैं वे टिप्पणी भी कर रहे हैं.
आप ही एक प्रविष्टी सविस्तार लिख कर समझाओ यार.
Linux par Devanagri abhi tak nahi dal paya hoon isliye Roman mein.
Aapki niyat aur neeyat ka khairam-kadam.Ek sarvekshan yah bhi kar lena chaihye ki cyber-cafe se kitne log likhtey hain aur ghar ya daftar ke sangaNak se kitne?Baki tathyon ke anuroop yah aankada bhi hoga.Chot karte rahiye.Badhaaee.
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